युवा उद्यमी योजना में बैंकों की अरुचि: सवाल सिर्फ ऋण का नहीं, व्यवस्था की विश्वसनीयता का है
अखबार में प्रकाशित यह खबर एक साधारण सरकारी योजना की प्रगति रिपोर्ट नहीं है। यह उस आईने की तरह है, जिसमें हमारी रोजगार व्यवस्था, बैंकिंग प्रणाली, सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और युवा उद्यमिता की वास्तविक स्थिति एक साथ दिखाई देती है।
खबर के अनुसार मुख्यमंत्री युवा उद्यमी अभियान योजना के तहत स्वरोजगार के लिए ऋण देने में कई बैंक रुचि नहीं ले रहे हैं। एमएसएमई विभाग के अनुसार सूचीबद्ध 43 बैंकों में 13 बैंकों ने एक भी आवेदन मंजूर नहीं किया, जबकि 14 बैंकों ने कोई ऋण वितरित नहीं किया। दूसरी ओर, चालू वित्तीय वर्ष में 10 सितंबर तक 41,350 लोगों को ₹1,716.43 करोड़ का ऋण दिए जाने की जानकारी है।
यहां से एक गंभीर सवाल पैदा होता है—
जब सरकार युवा को उद्यमी बनाना चाहती है, तो क्या बैंकिंग व्यवस्था भी उसी गति से युवा के साथ खड़ी है?
युवा से कहा जाता है—नौकरी खोजने वाला मत बनो, रोजगार देने वाला बनो।
उसे उद्यमिता के लिए प्रेरित किया जाता है। योजनाएं बनाई जाती हैं। पोर्टल बनाए जाते हैं। आवेदन मांगे जाते हैं। लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं।
लेकिन जब वही युवा बैंक के दरवाजे पर अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए पहुंचता है, तब यदि उसे फाइल, कागज, पात्रता, गारंटी, जोखिम और बैंक की अपनी प्रक्रियाओं के बीच बार-बार रोका जाए, तो हमें यह भी पूछना चाहिए कि क्या हमने वास्तव में उद्यमिता को आसान बनाया है?
---
आवेदन से स्वीकृति तक और स्वीकृति से वितरण तक—कहां टूट रही है कड़ी?
खबर में दिए आंकड़े स्वयं बहुत कुछ कहते हैं।
1,56,204 आवेदन प्राप्त हुए।
1,42,000 आवेदन बैंकों को भेजे गए।
और उनमें से 42,574 को ऋण की स्वीकृति दी गई।
अर्थात आवेदन करना और वास्तविक वित्तीय सहायता प्राप्त करना दो अलग-अलग चरण हैं।
यही वह जगह है जहां हमें केवल यह नहीं देखना चाहिए कि कितने आवेदन आए, बल्कि यह देखना चाहिए कि—
कितने युवाओं ने वास्तव में व्यवसाय शुरू किया?
कितनों को बैंक से पैसा मिला?
कितनों की फाइल लंबित है?
कितने आवेदन वापस किए गए और क्यों?
कितनों को तकनीकी/दस्तावेजी कमी बताकर रोका गया?
कितने प्रस्ताव बैंक स्तर पर अस्वीकृत हुए?
अस्वीकृति का वास्तविक कारण क्या था?
ऋण मिलने के बाद कितने उद्यम टिके?
कितने नए रोजगार पैदा हुए?
योजना की सफलता आवेदन संख्या से नहीं, जमीन पर खड़े हुए उद्यम से मापी जानी चाहिए।
---
आईना बैंकों को ही नहीं, सरकारी तंत्र को भी देखना होगा
यह लेख किसी बैंक या अधिकारी पर व्यक्तिगत आरोप लगाने के लिए नहीं है।
लेकिन यदि किसी योजना में 43 सूचीबद्ध बैंकों में 13 बैंक एक भी आवेदन मंजूर नहीं करते और 14 बैंक ऋण वितरित नहीं करते, तो यह केवल बैंक की समस्या कहकर आगे बढ़ जाना भी पर्याप्त नहीं है।
यह प्रशासन के लिए भी आत्ममंथन का विषय होना चाहिए।
यदि सरकार ने योजना बनाई है तो उसके लिए—
लक्ष्य + बजट + आवेदन प्रणाली + बैंकिंग चैनल + निगरानी + जवाबदेही + परिणाम मूल्यांकन
की पूरी श्रृंखला प्रभावी होनी चाहिए।
सिर्फ योजना की घोषणा कर देना पर्याप्त नहीं है।
---
युवा के हाथ में फॉर्म नहीं, अवसर चाहिए
आज देश में लाखों युवा रोजगार चाहते हैं। बहुत से युवा नौकरी के बजाय अपना व्यवसाय करना चाहते हैं। गांवों में ऐसे युवा भी हैं जो—
कृषि आधारित व्यवसाय शुरू करना चाहते हैं,
खाद्य प्रसंस्करण करना चाहते हैं,
FPO/FPC से जुड़कर व्यापार करना चाहते हैं,
ग्रामीण उत्पादों की ब्रांडिंग करना चाहते हैं,
ई-कॉमर्स और डिजिटल व्यापार करना चाहते हैं,
स्थानीय स्तर पर सेवा व्यवसाय शुरू करना चाहते हैं,
महिला समूहों के उत्पादों का बाजार बनाना चाहते हैं।
लेकिन उद्यमिता केवल ₹5 लाख की ऋण सीमा से पैदा नहीं होती।
उद्यमिता के लिए चाहिए—
विचार + प्रशिक्षण + बाजार + पूंजी + मार्गदर्शन + निरंतर सहयोग।
अगर युवा को केवल ऋण दे दिया और उसके बाद उसे बाजार, प्रबंधन, लेखांकन, बिक्री और व्यवसाय संचालन के लिए अकेला छोड़ दिया, तो ऋण भी उसके लिए समाधान के बजाय बोझ बन सकता है।
---
बैंक का सवाल भी समझना होगा
आईना केवल सरकार और बैंक को दिखाना पर्याप्त नहीं है। युवा उद्यमी को भी आईना देखना होगा।
हर आवेदन केवल इसलिए ऋण योग्य नहीं हो जाता कि वह सरकारी योजना के अंतर्गत आया है।
बैंक को भी देखना पड़ता है—
व्यवसाय की व्यवहार्यता,
नकदी प्रवाह,
पुनर्भुगतान क्षमता,
दस्तावेज,
क्रेडिट इतिहास,
बाजार की संभावना,
परियोजना की वास्तविकता।
इसलिए समाधान बैंक को मजबूर करना बनाम युवा को दोष देना नहीं हो सकता।
समाधान है—
बेहतर Project Report + उद्यमिता प्रशिक्षण + बैंक योग्य व्यवसाय मॉडल + बाजार से जुड़ाव + पारदर्शी बैंकिंग प्रक्रिया।
---
सबसे बड़ा सवाल: बैंक जोखिम से डर रहा है या व्यवस्था जोखिम को कम करने में असफल है?
अगर कोई युवा पहली बार व्यवसाय शुरू कर रहा है तो उसके पास बड़ी संपत्ति, पुराना कारोबार या वर्षों का बैंकिंग इतिहास होना जरूरी नहीं है।
यही कारण है कि सरकारें उद्यमिता योजनाओं में सहायता, गारंटी, ब्याज सहायता अथवा अन्य प्रोत्साहन देती हैं।
फिर भी यदि बैंकिंग स्तर पर बड़ी संख्या में प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ते, तो यह देखना जरूरी है कि समस्या कहां है।
क्या योजना की जानकारी शाखा स्तर तक पर्याप्त है?
क्या बैंक कर्मचारियों को योजना की सही समझ है?
क्या युवा को आवेदन से पहले उचित मार्गदर्शन मिलता है?
क्या परियोजना रिपोर्ट वास्तविक व्यवसाय के आधार पर तैयार होती है?
क्या बैंक और विभाग के बीच नियमित समीक्षा होती है?
क्या अस्वीकृत आवेदनों का स्वतंत्र विश्लेषण होता है?
इन सवालों के जवाब बिना खोजे हम केवल आंकड़े प्रकाशित करते रहेंगे।
---
ग्रामीण भारत में इसका प्रभाव और भी बड़ा है
शहरी युवा के पास विकल्प अपेक्षाकृत अधिक हैं। लेकिन ग्रामीण युवा के सामने स्थिति अलग है।
गांव में यदि एक युवा—
कृषि प्रसंस्करण इकाई लगाता है,
स्थानीय खाद्य उत्पाद बेचता है,
FPO का उत्पाद खरीदकर बाजार तक पहुंचाता है,
पैकेजिंग करता है,
ग्रामीण महिलाओं के उत्पाद बेचता है,
या स्थानीय स्तर पर कोई सेवा व्यवसाय शुरू करता है—
तो वह केवल अपना रोजगार नहीं बनाता।
वह किसान की उपज के लिए बाजार,
महिलाओं के लिए आय,
युवाओं के लिए रोजगार,
और गांव की अर्थव्यवस्था के लिए नया व्यापार पैदा कर सकता है।
इसलिए युवा उद्यमिता को केवल व्यक्तिगत रोजगार की योजना मानना बड़ी भूल होगी।
यह स्थानीय अर्थव्यवस्था निर्माण की योजना है।
---
योजनाओं का असली ऑडिट कागज पर नहीं, गांव में होना चाहिए
समय आ गया है कि सरकारी योजनाओं की सफलता के लिए नए पैमाने बनाए जाएं।
केवल यह न बताया जाए कि—
कितने आवेदन आए?
बल्कि पूछा जाए—
कितने उद्यम शुरू हुए?
कितने टिके?
कितना कारोबार हुआ?
कितने लोगों को रोजगार मिला?
किसान की आय पर क्या प्रभाव पड़ा?
कितनी महिला उद्यमी आर्थिक रूप से मजबूत हुईं?
कितने युवा पलायन रोककर अपने गांव में व्यवसाय कर पाए?
यही वास्तविक परिणाम हैं।
---
एक और कठोर आईना
हमारे समाज में भी विरोधाभास है।
हम युवाओं से कहते हैं—
> “सरकारी नौकरी के पीछे मत भागो, उद्यमी बनो।”
लेकिन जब युवा वास्तव में उद्यमी बनने की कोशिश करता है, तो कई बार उसे हम ही कहते हैं—
“व्यवसाय में जोखिम है।”
हम कहते हैं—
“लोन ले लो।”
फिर कहते हैं—
“बैंक से लोन मिलना आसान नहीं है।”
हम कहते हैं—
“अपना रोजगार पैदा करो।”
लेकिन बाजार से जोड़ने की व्यवस्था कमजोर रहती है।
हम कहते हैं—
“गांव में रहकर कमाओ।”
लेकिन गांव के उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने की मजबूत व्यवस्था नहीं बनाते।
यह विरोधाभास खत्म करना होगा।
---
अब समय लक्ष्य का नहीं, जवाबदेही का है
सरकारी योजना का लक्ष्य केवल इतना नहीं होना चाहिए कि ₹1,716.43 करोड़ का ऋण वितरित हुआ।
अगला सवाल होना चाहिए—
इस धन से कितने टिकाऊ व्यवसाय खड़े हुए?
कितने नए रोजगार बने?
कितने परिवारों की आय बढ़ी?
कितने युवा आत्मनिर्भर हुए?
और सबसे महत्वपूर्ण—
जिन बैंकों ने आवेदन तो प्राप्त किए लेकिन ऋण वितरण नहीं किया, वहां बाधा क्या थी?
जब तक इन सवालों के उत्तर सार्वजनिक रूप से नहीं खोजे जाएंगे, तब तक योजनाएं कागज पर सफल और जमीन पर अधूरी दिखाई देती रहेंगी।
---
निष्कर्ष: युवा को भाषण नहीं, भरोसे की व्यवस्था चाहिए
भारत का युवा केवल सहायता पाने वाला वर्ग नहीं है। उसमें व्यवसाय खड़ा करने, रोजगार पैदा करने और स्थानीय अर्थव्यवस्था बदलने की क्षमता है।
लेकिन उसके सामने व्यवस्था की हर दीवार खड़ी कर देना और फिर उससे आत्मनिर्भर बनने की अपेक्षा करना उचित नहीं है।
सरकार को नीति बनानी होगी।
बैंक को भरोसा दिखाना होगा।
विभाग को निगरानी करनी होगी।
विशेषज्ञों को मार्गदर्शन देना होगा।
और युवा को भी जिम्मेदारी के साथ उद्यम चलाना होगा।
तभी योजना “ऋण वितरण” से आगे बढ़कर “रोजगार निर्माण” बनेगी।
और यही इस खबर का सबसे बड़ा संदेश है—
> युवा को उद्यमी बनाने के लिए केवल पैसा देना पर्याप्त नहीं है; उसे ऐसा पूरा तंत्र देना होगा, जिसमें वह व्यवसाय शुरू भी कर सके, चला भी सके और बढ़ा भी सके।
क्योंकि बेरोजगारी का स्थायी समाधान नौकरी बांटना नहीं, बल्कि ऐसे लाखों सक्षम उद्यमी तैयार करना है जो स्वयं भी कमाएं और दूसरों को भी रोजगार दें।

Comments
Post a Comment