दस हजार एफपीओ बन गए, हजारों करोड़ का कारोबार भी हुआ… फिर किसान पूछ रहा है—मुझे मिला क्या?

 



कागज पर मजबूत दिखते किसान उत्पादक संगठन, लेकिन जमीन पर कितने किसानों की बदली आर्थिक तस्वीर? योजना, सीबीबीओ और एफपीओ की कार्यशैली पर गंभीर सवाल



— ई. प्रकाश पाण्डेय, संस्थापक, तेजस्वी संगठन न्यास

देश में किसान उत्पादक संगठन कोई नई अवधारणा नहीं है। वर्ष २०११-१२ के आसपास इनके विकास की शुरुआत हुई, वर्ष २०१३ में दिशा-निर्देश आए और वर्ष २०१४ में इसे विशेष महत्व मिला। इसके बाद २९ फरवरी २०२० को दस हजार किसान उत्पादक संगठनों की योजना शुरू हुई। हजारों करोड़ रुपये के प्रावधान के साथ प्रबंधन सहायता, अंश पूंजी अनुदान, ऋण गारंटी और वर्षों तक मार्गदर्शन की व्यवस्था की गई। उद्देश्य स्पष्ट था—किसान अकेला उत्पादक न रहे, बल्कि सामूहिक खरीद, उपज संग्रहण, प्रसंस्करण, उत्पाद-चिह्न, विपणन और बिक्री के माध्यम से अपनी आर्थिक ताकत बढ़ाए।

आज दस हजार किसान उत्पादक संगठनों का लक्ष्य पूरा होने, लाखों किसानों के शेयरधारक बनने और हजारों करोड़ रुपये के कारोबार की उपलब्धियां सामने हैं। लेकिन इन उपलब्धियों के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल आंकड़ों का नहीं, किसान का है—मेरे उत्पाद का मूल्य कितना बढ़ा? मेरी लागत कितनी घटी? मेरी आय कितनी बढ़ी? मेरे संगठन ने मुझे स्थायी बाजार दिया या नहीं?

शेयरधारक बढ़े, क्या किसान भी जुड़े?

किसान उत्पादक संगठन की सफलता केवल पंजीकृत सदस्यों और शेयरधारकों की संख्या से नहीं मापी जा सकती। असली सवाल है—कितने किसान नियमित रूप से संगठन को उपज बेचते हैं, संगठन से खरीद करते हैं, निर्णय प्रक्रिया में भाग लेते हैं और उससे आर्थिक लाभ प्राप्त करते हैं?

हमारे मैदानी आकलन में कई क्षेत्रों में लगभग ८० प्रतिशत दर्ज शेयरधारक किसान उत्पादक संगठन की परियोजना और उसके वास्तविक कारोबार से पर्याप्त रूप से परिचित नहीं दिखाई देते। यह राष्ट्रीय स्तर का प्रमाणित आंकड़ा नहीं, बल्कि मैदानी अनुभव है, जिसकी स्वतंत्र जांच आवश्यक है।

इसी प्रकार हमारे संपर्क तंत्र के आकलन में स्वयं पहल से बने किसान उत्पादक संगठनों में लगभग ७० प्रतिशत संगठन सक्रिय व्यवसायिक स्थिति में दिखाई देते हैं, जबकि सरकारी योजना के अंतर्गत प्रोत्साहित संगठनों में यह स्तर कई क्षेत्रों में अधिकतम लगभग १० प्रतिशत तक दिखाई देता है। यदि यह अंतर वास्तव में मौजूद है तो इसके कारणों की निष्पक्ष जांच क्यों नहीं होनी चाहिए?

सीबीबीओ से सवाल—संगठन बना या व्यवसाय भी बनाया?

सीबीबीओ की जिम्मेदारी केवल पंजीकरण, बैठक और कागजी कार्यवाही तक सीमित नहीं थी। किसान पहचान, आधारभूत सर्वेक्षण, मूल्य शृंखला अध्ययन, किसान सहभागिता, निदेशक मंडल का प्रशिक्षण, व्यवसाय योजना, वित्तीय प्रबंधन, बाजार संपर्क, प्रसंस्करण और दीर्घकालीन व्यवसाय निर्माण भी उसकी भूमिका का हिस्सा है।

फिर सवाल होना चाहिए—कितनी व्यवसाय योजनाएं वास्तव में लागू हुईं? कितने संगठनों ने नियमित रूप से किसानों से उपज खरीदी? कितनों ने प्रसंस्करण शुरू किया? कितनों ने अपना उत्पाद-चिह्न बनाया? कितनों को स्थायी खरीदार मिले? और कितने संगठन आज बिना सरकारी सहायता के अपना खर्च चला सकते हैं?

किसान उत्पादक संगठन या केवल कृषि सामग्री की दुकान?

कई क्षेत्रों में किसान उत्पादक संगठनों का कारोबार मुख्यतः खाद, बीज, कीटनाशक और अन्य कृषि सामग्री की बिक्री तक सीमित दिखाई देता है। यह व्यवसाय अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन यदि किसान की उपज का संग्रहण, मूल्यवर्धन, प्रसंस्करण, उत्पाद-चिह्न और बाजार निर्माण नहीं हो रहा, तो किसान और सामान्य व्यापारी के बीच संस्था का अंतर कितना रह जाता है?

सही दिशा होनी चाहिए—

किसान → किसान उत्पादक संगठन → संग्रहण → प्रसंस्करण → उत्पाद-चिह्न → बाजार → उपभोक्ता।

किसान उत्पादक संगठन को किसान और व्यापारी के बीच एक और मध्यस्थ नहीं, बल्कि किसान के स्वामित्व वाला व्यवसाय बनना होगा।

करोड़ों का कारोबार, लेकिन किसान के हिस्से में कितना?

कारोबार बड़ा होना सफलता का अंतिम प्रमाण नहीं है। समान कारोबार वाली दो संस्थाओं में एक कम लाभ वाले व्यापार पर निर्भर हो सकती है और दूसरी प्रसंस्करण, अपने उत्पाद-चिह्न तथा सीधे बाजार से अधिक लाभ कमा सकती है। इसलिए कारोबार के साथ सकल लाभ, शुद्ध लाभ और किसान को मिला वास्तविक आर्थिक लाभ भी देखना होगा।

कारोबार संस्था का आकार बताता है, लाभ व्यवसाय की मजबूती और किसान का लाभ संस्था की वास्तविक सफलता।

निदेशक मंडल की भूमिका भी केवल बैठक और हस्ताक्षर तक सीमित नहीं होनी चाहिए। प्रत्येक निदेशक को किसान संपर्क, उपज संग्रहण, कृषि सामग्री, प्रसंस्करण, उत्पाद-चिह्न, विपणन, वित्त, संस्थागत खरीदार, डिजिटल व्यापार और विस्तार जैसे व्यवसायिक क्षेत्रों की जिम्मेदारी लेनी होगी।

मुख्य कार्यकारी अधिकारी को भी केवल लेखा, कर, बिल और बैठकों की जानकारी नहीं, बल्कि सक्रिय किसान, संग्रहण, बिक्री, भंडार, बकाया, लाभ, खरीदार और अगले महीने के कारोबार की स्पष्ट जानकारी होनी चाहिए।

प्रशिक्षण हुआ बहुत, कारोबार कितना बना?

प्रशिक्षण की सफलता उपस्थिति और प्रमाणपत्र से नहीं, उसके बाद हुए कार्य से मापी जानी चाहिए।

प्रशिक्षण → कार्यान्वयन → निगरानी → मूल्यांकन → सुधार → विकास।

यदि प्रशिक्षण के बाद किसान नहीं जुड़ा, उपज नहीं खरीदी गई, बाजार नहीं बना और आय नहीं बढ़ी तो प्रशिक्षण का वास्तविक परिणाम क्या रहा—यह भी पूछना होगा।

अब समय है किसान उत्पादक संगठन के पुनर्गठन का

पहले से बने संगठनों का स्वतंत्र जमीनी परीक्षण होना चाहिए। कितने सक्रिय किसान हैं? कितनी उपज खरीदी गई? किसानों को कितना भुगतान हुआ? बाजार से कितना बेहतर मूल्य मिला? लागत कितनी घटी? कितना प्रसंस्करण हुआ? अपना उत्पाद-चिह्न कितना चला? कितने खरीदार हैं? कितना शुद्ध लाभ है? किसान को वास्तविक लाभ कितना मिला?

सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा यह हो सकती है—

यदि कोई किसान उत्पादक संगठन अगले बारह महीने बंद हो जाए तो उसके सक्रिय किसानों को कितना आर्थिक नुकसान होगा?

यदि उत्तर लगभग शून्य है तो यह संकेत है कि संस्था अभी किसान की आर्थिक व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा नहीं बनी है।

अब सवाल केवल “कितने एफपीओ बने?” का नहीं है

सरकार नीति और संसाधन दे सकती है। सीबीबीओ मार्गदर्शन दे सकता है। लेकिन रोज का व्यवसाय किसान उत्पादक संगठन के निदेशक मंडल और प्रबंधन को ही करना होगा।

अनुदान से संस्था शुरू हो सकती है, व्यवसाय से संस्था चलती है।

अब आवश्यकता केवल नए किसान उत्पादक संगठन बनाने की नहीं, बल्कि बने हुए संगठनों को वास्तविक किसान व्यवसाय में बदलने की है। कागज से खेत तक, शेयरधारक से सक्रिय किसान तक, प्रशिक्षण से कार्यान्वयन तक, अनुदान से व्यवसाय तक और उत्पादक से उद्यमी तक की यात्रा पूरी करनी होगी।

आखिर किसान का सवाल सीधा है—“एफपीओ तो बन गया, लेकिन मेरी जिंदगी में बदला क्या?”

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